सुबह की याद में कितनी शामें गुज़ार दी,
तेरे हिस्से की ख़ुद्दारी पहले महसूस नहीं की।
पीपल के पेड़ तले क्या फिर से साथ चाय पी सकते हैं,
जो बातें अधूरी रह गईं, क्या फिर से वो बात कर सकते हैं।
तेरी ख़ामोशी को मैंने बस ज़िद समझ लिया था,
तेरे दर्द की गहराई को कहाँ समझ लिया था।
अब लौटकर तेरी चौखट पे सवाल लिए बैठा हूँ,
क्या बीते हुए लम्हों से फिर मुलाक़ात कर सकते हैं।
वो कप, वो धुआँ, वो शाम और तेरी आँखें,
आज भी दिल में वैसे ही रखी हैं हमारी वो मुलाक़ातें।
अगर वक्त इजाज़त दे तो एक बार फिर मिलना,
पीपल की छाँव में बैठकर क्या कुछ पुरानी बात कर सकते हैं ?
-रतन कुमार कैथवास