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दो स्ट्रांग...

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            लगता है इस धुंध भरे मौसम में, दूर वहाँ अलाव जल रहा है,
        
                                                    
                            
यहाँ से केवल धुआँ दिख रहा है।
सर्दी धीरे-धीरे बढ़ रही है,
मुँह से अब भाप भी निकलने लगी है...
मैंने स्वेटर की बाँहें थोड़ी और नीचे की,
हथेलियों को आपस में रगड़ा,
और मुस्कुराकर उसकी तरफ़ देखा।

मैंने, इशारे में बस इतना कहा…
"दो स्ट्रॉंग..."
उसने कुछ नहीं पूछा।
जिन रिश्तों में बरसों की पहचान बस जाती है,
वहाँ पूरी बातें नहीं,
आधे इशारे भी, मुकम्मल वाक्य बन जाते हैं।
थोड़ी देर बाद,
वो रसोई से बाहर निकली।
दोनों हाथों में दो मग थे।
कॉफ़ी की भाप,
ऐसे उठ रही थी,
जैसे सर्द सुबह में,
कोई ख़ामोश दुआ आसमान की ओर जा रही हो।

हम दोनों…
काजू के उसी पुराने पेड़ के नीचे बैठ गए।
हवा ठंडी थी,
मगर कॉफ़ी इतनी गर्म,
कि उँगलियों को भी सहारा मिल गया।
पहली चुस्की लेते ही उसने कहा…
"याद है,
इसी पेड़ के नीचे तुमने कहा था,
'मौसम बदलते रहेंगे,
बस तुम मत बदलना।'"
मैं हल्का-सा मुस्कुराया।
"और तुमने जवाब दिया था…
'पेड़ अगर जड़ों से जुड़ा रहे,
तो पतझड़ भी उसे डराता नहीं।'"

कुछ देर तक,
सिर्फ़ कॉफ़ी बोलती रही,
हम दोनों चुप थे।
दूर कहीं कोई अलाव जल रहा था।
धुआँ धुंध में घुलकर,
ऐसा लगता था,
मानो किसी की पुरानी यादें,
आसमान तक पहुँचने की कोशिश कर रही हों।

उसने मग, दोनों हथेलियों में समेट लिया।
बोली…
"अजीब बात है न...
उस वक़्त हमारे पास,
ज़्यादा कुछ नहीं था,
फिर भी सब कुछ था।"
मैंने धीरे से कहा…
"क्योंकि उस समय,
घड़ी की सुइयों से ज़्यादा,
हम एक-दूसरे के लिए वक़्त रखते थे।"

वो मेरी ओर देखती रही।
उसकी आँखों में,
कॉफ़ी की भाप से ज़्यादा,
यादों की नमी उतर आई थी।
मैंने कहा…
"देखो,
ऋतुएँ तो आज भी आती हैं,
सर्दियाँ आज भी पड़ती हैं,
कॉफ़ी आज भी उतनी ही गर्म बनती है,
काजू का पेड़ भी आज वहीं खड़ा है...

बदला है तो बस इतना,
कि पहले हम उन लम्हों को जी रहे थे,
अब उन्हें याद कर रहे हैं।"
उसने आख़िरी चुस्की ली,
खाली मग ज़मीन पर रखा,
और आसमान की ओर देखकर बोली…
"काश...
समय भी कभी
कॉफ़ी की भाप की तरह,
थोड़ी देर ठहर जाता।"
मैंने मुस्कुराकर कहा…
"समय कभी नहीं ठहरता,
लेकिन कुछ शामें, कुछ पेड़,
कुछ अधूरे इशारे,
और दो 'स्ट्रॉंग कॉफ़ी' के मग,


उम्र भर के लिए स्मृति में बसेरा बना लेते हैं।
ऋतुएँ बदलती रहती हैं,
मगर जिन लम्हों में सच्ची अपनाइश घुल जाए,
वे कैलेंडर के नहीं,
दिल के मौसम बन जाते हैं।
इन्हें याद करो तो आँखें नम होती हैं,
और होंठों पर अनायास वही पुरानी मुस्कान लौट आती है…
जैसे ठिठुरती सुबह में,
एक बार फिर किसी ने इशारे से कहा हो…
दो स्ट्रॉंग...
-रतन कुमार कैथवास
2 महीने पहले
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