तेरी यादों के सिवा, इस गली में रखा क्या है..."
इतना ही कहा था मैंने,
कि अचानक एक बादल,
आसमान की ख़ामोशी पर, अपना नाम लिख गया।
ज़ोर से गरजा...
और तेज़ हवाओं ने जैसे
बरसात को इशारा कर दिया।
मैं भागकर उसी पुराने छज्जे के नीचे, आ खड़ा हुआ,
जहाँ कभी तुमने हँसते हुए कहा था…
"बारिश में भीगने से ज़्यादा मज़ा,
किसी अपने के साथ बारिश देखने में है।"
चाय वाले ने बिना पूछे,
दो कुल्हड़ रख दिए।
मैंने मुस्कुराकर कहा…
"भाई, आज तो मैं अकेला हूँ।"
वो बोला…
"साहब, इंतज़ार करने वाले कभी अकेले नहीं होते।"
मैंने दूसरा कुल्हड़,
वैसे ही अपने पास रहने दिया।
हवा उसकी भाप को,
तुम्हारी तरफ़ उड़ाती रही,
और मेरा वहम,
हर घूँट के साथ यक़ीन बनता गया।
मुझे लगा,
तुम मेरे बिल्कुल पास बैठी हो,
बारिश की हर बूँद पर,
अपनी हँसी टाँक रही हो,
और कह रही हो…
"इतनी गरम चाय मत पिया करो,
ज़ुबान जल जाएगी।"
मैंने पलटकर देखा...
छज्जे के नीचे सिर्फ़ मैं था,
एक खाली कुल्हड़ था,
और सामने बरसता हुआ मौसम।
बाक़ी सब,
मेरी यादों की शरारत थी।
इतने में हवा का एक झोंका आया,
तुम्हारी ख़ुशबू जैसा, भ्रम छोड़ गया।
मैंने आँखें बंद कर लीं,
सोचा...
अगर मोहब्बत का कोई मौसम होता,
तो उसका नाम बरसात ही होता।
मगर जब आँखें खोलीं,
तुम कहीं नहीं थीं।
सिर्फ़ बारिश थी,
भीगी हुई सड़कें थीं,
और मेरी पलकों पर ठहरा हुआ,
एक अधूरा-सा सवाल।
फिर न जाने क्यों,
आँखें ख़ुद-ब-ख़ुद नम हो गईं।
शायद बारिश बाहर कम,
मेरे भीतर ज़्यादा हो रही थी।
मैंने आसमान की तरफ़ देखकर धीरे से कहा…
"ऐ बादल, इतना मत बरस कि शहर डूब जाए,
थोड़ा मेरी आँखों के लिए भी छोड़ दे।
लोग समझेंगे मौसम का असर है,
उन्हें क्या पता,
मैं हर बरसात में उसके साथ
एक छज्जे के नीचे बैठकर,
दो कुल्हड़ चाय पी लेता हूँ…
एक अपने हिस्से की,
और एक उसकी याद के नाम।"
-रतन कुमार कैथवास