तुम क्या समझो, उस दरिया ने क्या-क्या सहा
तुमने तो बस वहाँ से पानी ले जाना बंद कर दिया।
जिस घाट पर हर रोज़ तुम्हारी आहट गूँजा करती थी,
वहाँ पत्थरों ने भी धीरे-धीरे बोलना छोड़ दिया।
सुबह की पहली किरण जब लहरों को छूने आती थी,
दरिया तेरी परछाईं ओढ़कर मुस्कुराया करती थी।
जिस दिन तुमने रुख़ बदला, उसने भी किनारों से टकराना छोड़ दिया।
मछुआरा रोज़ जाल लिए उम्मीद से निकलता रहा,
पर मछलियों ने भी जैसे रास्ता बदल लिया।
कहने लगा, "पानी तो बह रहा है, मगर दरिया ने जीना छोड़ दिया।"
बरगद की छाँव में बैठा एक बूढ़ा मुसाफ़िर बोला,
"रिश्ते सूखते पानी से नहीं, इंतज़ार से सूखते हैं।"
और यह कहकर उसने अपनी लाठी उठाई, और चल दिया।
बादल कई बार आए, बरसे भी जी-भरकर,
लेकिन प्यास वहीं की वहीं रही।
कुछ कमी आसमान में नहीं थी,
किसी ने भरोसे का घड़ा ले जाना छोड़ दिया।
मैं जब बरसों बाद उसी राह से फिर गुज़रा,
दरिया अब भी वहीं थी, मगर कुछ बदला-बदला था।
उसकी लहरें पूछ रही थीं…
"जिसे अपना समझा था, उसने लौटकर देखना क्यों छोड़ दिया?"
तब जाना, टूटना हमेशा शोर से नहीं होता,
कई बार ख़ामोशियाँ भी पूरा शहर उजाड़ देती हैं।
और कुछ बिछड़न ऐसी होती हैं,
जिनमें कोई मरता नहीं, मगर जीना थोड़ा-थोड़ा छोड़ देता है।
तुम क्या समझो, उस दरिया ने क्या-क्या सहा
तुमने तो बस वहाँ से पानी ले जाना बंद कर दिया।
दरिया ने तो तुम्हारे बाद,
हर आने-जाने वाले चेहरे में, तुम्हें ढूँढ़ना भी नहीं छोड़ा।
-रतन कुमार कैथवास