एक रोटी की ख़ातिर सफ़र कट गया,
उम्र की धूप में हर बदन बँट गया।
जेब खाली रही, दिल मगर भर गया,
तेरी आवाज़ ही साथ चलती रही।
माँ ने पूछा, "थके हो?" हँसाकर कहा,
"बस ज़रा-सी हवा से उलझना पड़ा।"
वो तो आँखों की नमी पढ़ गई चुपचाप,
ओढ़नी रात भर अश्क सिलती रही।
घर की दीवार पर एक तस्वीर थी,
जिसमें मुस्कान की आख़िरी लकीर थी।
धूल आती रही, वक़्त ढकता रहा,
याद लेकिन वहीं साँस लेती रही।
कर्ज़ सिर पर था और सपने भी थे,
दोनों अपने-अपने हिसाबों में थे।
हमने ख़ुद को ही बाज़ार में रख दिया,
ज़िंदगी फिर भी किस्तें बदलती रही।
तेरे ख़त आज भी संदूक में हैं पड़े,
कुछ अधूरे से वादे, कुछ भीगे धड़े।
स्याही सूख गई, अल्फ़ाज़ ज़िंदा रहे,
हर पंक्ति दिल की धड़कन मचलती रही।
एक मज़दूर ने शाम को जब कहा,
"आज बच्चों के हिस्से में रोटी रहे।"
अपने हिस्से की भूख समेटे हुए,
वो दुआ बनके चुपचाप ढलती रही।
चाँद छत पर कई रात उतरा मगर,
तेरे चेहरे का उजला असर न मिला।
आसमाँ अपनी चादर बिछाता रहा,
चाँदनी तेरी आहट टटोलती रही।
हमने रिश्तों को साँसों-सा सींचा बहुत,
लोग मौसम समझकर बदलते गए।
हम खड़े रह गए एक बरगद की तरह,
धूप शाख़ों पे आकर फिसलती रही।
अब न शिकवा बचा, न गिला ही कोई,
बस यही है कि तुझको ख़बर न हुई।
हम तो हर मोड़ पर तेरे अपने रहे,
तू मगर भीड़ में ही निकलती रही।
किश्त भरने की खातिर,
हमीं ना रुके।
दर्द अपना छुपाकर हँसी बाँट दी,
ज़िंदगी उम्र भर यूँ ही चलती रही।
होश में हम रहे,
बस्तियाँ रात भर यूँ खनकती रही।
-रतन कुमार कैथवास