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दर्द अगर गंगा बन जाए, जग का प्यासा मन भर जाए

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            पर्वत से आँसू बहते हैं, क्या है उसका दर्द समझ तू,
        
                                                    
                            
वीराने में बैठा है अकेला, मन में शिवाला बसाया है क्या तू?
पत्थर-पत्थर मौन खड़ा है, फिर भी कैसी पीर छुपाए,
बर्फ़ की चादर ओढ़े पर्वत, भीतर आग जलाया है क्या तू?

झरने बनकर दर्द बहाता, नदियों को पैग़ाम सुनाता,
अपने सीने की हलचल से, धरती का संताप मिटाता।
कौन सुनेगा व्यथा तुम्हारी, कौन गले से तुझे लगाए,
ऊँचाई पर खड़े-खड़े तू, किसको अपना हाल सुनाता?

बादल आकर गले लगाते, बिजली तुझको छूकर जाती,
तेरी चोटी पर बैठी धूप भी, ढलते-ढलते खो जाती।
फिर भी तेरा धैर्य न टूटे, सीना ताने खड़ा हुआ है,
किस तपस्या में लीन है पर्वत, कौन-सी धुन तुझे बुलाती?

वीराने की गोद में बैठा, किसकी माला जपता है,
हर पत्थर में शंकर देखे, किस विश्वास से तपता है?
न मंदिर की घंटी सुनता, न कोई आरती होती,
फिर भी तेरे अंतर्मन में, डमरू कैसे बजता है?

पर्वत, तेरी चुप्पी में भी, कोई मंत्र सुनाई देता है,
तेरे आँसू का हर क़तरा, जीवन-पाठ पढ़ाता है।
दर्द अगर गंगा बन जाए, प्यासे जग का मन भर जाए,
शिव को पाने वाला प्राणी, पहले ख़ुद को क्या समझाए।
-रतन कुमार कैथवास
14 घंटे पहले
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