हमारी ये कोशिश है कि, ये चाँद ज़मीं पर उतरे,
मगर उसके तारों को क्या करूँ?
वो मान भी जाए, तो आसमान रूठ जाएगा,
उसकी रातों के पहरेदारों को क्या करूँ?
मैंने एक शाम चाँद से कहा,
"ज़रा मेरे आँगन तक चलो,
यहाँ कोई बरसों से तुम्हारी राह देख रहा है।"
वो मुस्कुराया और बोला,
"आ जाऊँगा... मगर मेरे साथ चलने वाले सितारों का क्या होगा?"
मैं चुप हो गया।
फिर एक तारा टूटकर मेरी हथेली पर आ गिरा,
बोला…
"मोहब्बत सिर्फ़ पाने का नाम नहीं होती,
कई बार किसी को उसकी जगह पर, रहने देना भी इश्क़ होता है।"
उस रात मैंने देखा,
एक बच्चा छत पर लेटा चाँद देख रहा था,
उसने अपनी माँ से पूछा…
"अगर चाँद हमारे घर आ जाए,
तो बाकी बच्चों की छतों पर कौन जाएगा?"
माँ ने हँसकर उसके बाल सहलाए,
और बोली…
"बेटा, जो सबका है,
उसे किसी एक का नहीं बनाया जाता।"
तब समझ आया,
कुछ ख़्वाहिशें पूरी होने से ज़्यादा,
दिल में रहने पर ख़ूबसूरत लगती हैं।
अब मैं चाँद को बुलाता तो हूँ,
मगर उससे उतर आने की ज़िद नहीं करता।
बस इतना कहता हूँ…
"जब भी निकलना, मेरी खिड़की की तरफ़ एक बार देख लेना,
यही काफ़ी है कि तुम्हारी रोशनी मेरे हिस्से भी आती रहे।"
हमारी ये कोशिश है कि, ये चाँद ज़मीं पर उतरे,
मगर उसके तारों को क्या करूँ?
उन्हीं की चमक से तो उसकी पहचान है,
उन्हें जुदा कर दूँ, तो उस तारों का क्या करूँ?
-रतन कुमार कैथवास