जाड़े की भोर, हरी घास पर शबनम के ये मोती कैसे,
मौसम हमसे क्या कहता है, ख़ामोशी में बोलें जैसे।
सूरज की पहली किरणों से, चमक उठे हैं पत्ते सभी,
प्रकृति बिछाए प्रेम की चादर, धरती के हों भाग्य हँसी।
ठिठुरी हुई हवाओं में भी, जीवन के संगीत हैं कैसे,
सूखी डाली, पत्तों पर भी, रंगों के नवगीत हैं कैसे।
रात अँधेरी बीत गई तो, भोर सुनहरी आती है,
हर पतझड़ के बाद बहारें, जीने की राह दिखाती हैं।
शबनम के ये नन्हे मोती, पल भर में ढल जाते हैं,
फिर भी अपनी चमक से जग को, जीने का पाठ पढ़ाते हैं।
जीवन भी तो ओस सरीखा, पल-पल ढलता जाता है,
जो हर पल को जी ले हँसकर, वही ख़ज़ाना पाता है।
धुंध के घूँघट में लिपटी, राहें कुछ अनजानी हैं,
मौन खड़ी ये वृक्षों की कतारें, कहतीं अमर कहानी हैं।
मंज़िल उनको मिलती है जो, काँटों से घबराते नहीं,
जिनके हौसले ज़िंदा हों, तूफ़ानों में झुकते नहीं।
ऐ मौसम, तेरी ख़ामोशी में, कितने गहरे राज़ छिपे,
बूँद-बूँद में प्रेम बसा है, पत्तों-पत्तों में ख़्वाब छिपे।
जीवन का संदेश यही है, बाँटो खुशियाँ प्यार से,
फूलों जैसे खिलते रहना, लड़ते रहना अँधियारों से।
-रतन कुमार कैथवास