विज्ञापन

बुलंदियों की तलब है, तो ढलानों में चलो

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ज़रूर वो, मेरे किरदार पर सवाल करे,
        
                                                    
                            
मगर ये पूछना उससे, कभी वो मुझसे मिला भी है।
जो दूर बैठ के, करता है फ़ैसले मेरे,
उसे ख़बर भी है, मैं किन रास्तों से चला भी हूँ।

बुलंदियों की तलब है, तो ढलानों में चलो,
हर एक शिखर का रास्ता, ढलानों से जाता है।
जो धूप सहने का, हौसला रखते हैं सीने में,
उन्हीं के नाम का सूरज, जहाँ में चमकता है।

समंदरों ने छुपा रखे हैं, पहाड़ों के राज़,
हर एक गहराई में, कोई कहानी रहती है।
जो सिर्फ़ सतह से, पहचानते हैं दुनिया को,
उन्हें कहाँ किसी की, असलियत दिखती है।

जो मेरी ख़ामोशी को, मेरी शिकस्त समझते हैं,
उन्हें क्या पता, मेरे इरादे कितने बुलंद हैं अभी।
मैं वक़्त आने पर, जवाब दूँगा हर सवाल का,
मेरे सफ़र की, कई मंज़िलें बाक़ी हैं अभी।

नज़र उठाकर, ज़माने से बात करते हैं हम,
किसी की राय से, अपना वजूद घटता नहीं।
जो ख़ुद ही, अपनी नज़रों में बुलंद रहते हैं,
उन्हें किसी के, प्रमाणपत्र की ज़रूरत नहीं।
-रतन कुमार कैथवास
14 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Şhahnawaz Pahat

39 कविताएं

View Profile

Updesh Kumar

13403 कविताएं

View Profile

Ankit Kumar

11075 कविताएं

View Profile

Rajesh Kumar Sen Raj

4 कविताएं

View Profile

RATAN KUMAR

854 कविताएं

View Profile