तुम्हारी ख़ामोशी में,
हज़ार बातें होती हैं।
बस सुनने वाला
मेरे जैसा कलेजे वाला होना चाहिए।
एक दिन हम दोनों,
नदी के किनारे बैठे थे।
तुमने पूरे एक घंटे में,
शायद दस शब्द भी नहीं बोले।
आस-पास बैठे लोग,
तुम्हें देखकर सोच रहे थे…
"बहुत ख़ामोश लड़की है।"
मैं मन ही मन मुस्कुरा दिया।
क्योंकि मुझे पता था,
तुम बोल नहीं रही थीं,
लेकिन तुम्हारी उँगलियाँ,
बार-बार दुपट्टे का किनारा मोड़ रही थीं।
जब भी कोई पुरानी बात छू जाती,
तुम एक छोटा-सा पत्थर,
पानी में फेंक देती थीं।
और जब भी कोई अपना ज़िक्र आता,
तुम अनजाने में,
आसमान की तरफ़ देखने लगती थीं।
मैंने धीरे से पूछा…
"कुछ कहना है?"
तुमने सिर हिलाकर कहा…
"नहीं।"
लेकिन तुम्हारा "नहीं"
इतना भरा हुआ था,
कि उसमें,
सैकड़ों अधूरे "हाँ"
छिपे हुए थे।
मैंने फिर कुछ नहीं पूछा।
बस वहीं बैठा रहा।
थोड़ी देर बाद,
तुमने ख़ुद ही कहा…
"तुम अजीब हो।"
मैंने पूछा…
"क्यों?"
तुम बोली…
"बाकी लोग,
मेरे शब्द सुनते हैं,
तुम मेरी चुप्पी पढ़ लेते हो।"
मैं हँस पड़ा।
कहा…
"ख़ामोशी कभी ख़ाली नहीं होती।
वो तो सबसे लंबा ख़त होती है,
जिसमें शब्द नहीं,
धड़कनें लिखी होती हैं।"
तुमने पहली बार,
मेरी तरफ़ देखा।
आँखों में हल्की-सी नमी थी।
बोली…
"और अगर कोई,
उसे ग़लत पढ़ ले?"
मैंने मुस्कुराकर कहा…
"तो फिर वो,
आवाज़ों के बाज़ार का, आदमी होगा।
ख़ामोशी की किताब,
हर किसी के, बस की बात नहीं।"
शाम ढलने लगी।
लोग लौट गए।
नदी अब भी बह रही थी।
हम अब भी चुप थे।
लेकिन उस चुप्पी में,
इतनी बातें हो चुकी थीं,
जितनी कई लोग,
पूरी उम्र बोलकर भी नहीं कर पाते।
घर लौटते समय,
तुमने सिर्फ़ एक वाक्य कहा…
"आज बहुत सुकून मिला।"
मैंने कहा…
"क्योंकि आज,
तुम्हें बोलना नहीं पड़ा,
और मुझे,
समझने के लिए, पूछना नहीं पड़ा।"
उस दिन समझ आया,
इबादत की सबसे ऊँची भाषा,
शब्द नहीं होती।
वो वह भरोसा होता है,
जहाँ सामने वाला,
तुम्हारी आँखों में अटके हुए एक आँसू,
तुम्हारी साँस की हल्की-सी थरथराहट,
और तुम्हारी चुप्पी के पीछे छिपी पूरी कहानी
बिना किसी तर्जुमा के पढ़ ले।
क्योंकि...
तुम्हारी ख़ामोशी में सचमुच हज़ार बातें होती हैं,
बस सुनने वाला कानों से नहीं,
कलेजे से सुनने वाला होना चाहिए।
-रतन कुमार कैथवास