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बारिश जिंदगी थी

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तुम थे तो,
        
                                                    
                            
बारिश ज़िंदगी थी,
इस बार तो,
बस पानी बरस रहा है।
मैंने ख़ुद से वादा किया था,
उसे याद नहीं करूँगा।
उसकी गली से नहीं गुज़रूँगा,
उसका नाम नहीं लूँगा,
पुरानी तस्वीरें नहीं देखूँगा,
और...
उसकी प्रोफ़ाइल भी नहीं खोलूँगा।
कई दिनों तक,
मैं अपना वादा निभाता रहा।
फिर एक शाम,
बारिश होने लगी।
मोबाइल हाथ में था।
उँगलियाँ किसी और काम के लिए चली थीं,
लेकिन पता नहीं क्यों...
वही नाम,
वही तस्वीर,
वही प्रोफ़ाइल...
क्लिक हो ही गया।
मैं देर तक,
स्क्रीन को देखता रहा।
न कोई मैसेज,
न कोई शिकायत,
न कोई उम्मीद।
बस एक ख़ामोशी,
जो पहले भी हमारी थी,
आज भी हमारी है।
तभी पीछे से,
चाय वाले ने पूछा…

"भैया...
चाय ठंडी हो जाएगी।"
मैंने चौंककर मोबाइल बंद किया।
वो मुस्कुराकर बोला…
"बारिश में,
लोग चाय पीते हैं,
आप यादें पी रहे हो क्या?"
मैं हँस पड़ा।
बोला…
"कैसे पता?"
वो बोला…
"जो लोग बार-बार,
मोबाइल लॉक करके,
फिर खोलते हैं,
वो किसी ऐप में नहीं,
किसी अपने में उलझे होते हैं।"
मैंने खिड़की के बाहर देखा।
बारिश अब भी,
वैसी ही थी।
बदल गया था,
तो सिर्फ़ मेरा मौसम।
पहले हर बूँद में,
उसकी हँसी सुनाई देती थी।

अब हर बूँद,
बस छत से टकराकर,
आवाज़ कर रही थी।
तभी मन ने धीरे से कहा…
"तुम कहते हो,
याद नहीं करता...
फिर क्लिक क्यों हो जाता है?"
मैंने पहली बार,
अपने ही सवाल का जवाब दिया…
"क्योंकि भूलना,
उँगलियों का काम नहीं,
भूलना दिल का काम है।
और दिल...
वो किसी बटन से
डिलीट नहीं होता।"
घर लौटते समय,
मैंने मोबाइल जेब में रख दिया।
बारिश अब भी,
वैसी ही बरस रही थी।
लेकिन इस बार,
मैंने आसमान से शिकायत नहीं की।
बस इतना कहा…
"तुम थे तो बारिश ज़िंदगी थी,
अब बारिश सिर्फ़ मौसम है।

मगर शुक्रिया...
तुमने इतना तो सिखा दिया,
कि कुछ लोग चले जाते हैं,
फिर भी उनकी याद,
हर बार दस्तक देकर नहीं आती…
कभी-कभी बस एक छोटी-सी 'क्लिक' बनकर,
उँगलियों से दिल तक पहुँच जाती है।"
-रतन कुमार कैथवास
3 महीने पहले
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