बंधन कैसे तोड़ूँ अपने, दीपशिखा को मोड़ूँ कैसे,
मन की जलती लौ को आखिर आँधियों में छोड़ूँ कैसे।
दरिया में तो आग बहुत है, हरकत में अंगार बहुत है,
फिर भी अपने भीतर उठते इस सैलाब को रोकूँ कैसे।
धूमिल नज़रों से वो देखे, चारों ओर पहरेदार बहुत हैं,
मेरे हिस्से राह कम आई, उसके हिस्से द्वार बहुत हैं।
जिसने सपनों से रुसवाई की, उसको कैसे दोषी ठहराऊँ,
उसके भीतर भी तो शायद कुछ टूटे संसार बहुत हैं।
कपूर हथेली पर जलाता है, पल में राख बना देता है,
अपने ही हाथों अपने ख़्वाबों को बेआवाज़ मिटा देता है।
देख रहा हूँ उसकी आँखों में कितनी सूखी प्यास छुपी है,
रेत भले हो मन उसका, फिर भी बादल बरसा देता है।
इसको ऐसे छोड़ दूँ कैसे, बात अभी तो बाकी है,
पत्थर दिल में भी शायद कोई नर्म-सी झाँकी है।
आग बहुत है दरिया में तो, पानी बनकर जाना होगा,
जिस मन में मरघट बसता है, उसमें फिर हरियाली लानी है।
उसको कहना… ख़्वाब जलाना कोई जीत नहीं होती,
सूनी आँखों में दुनिया की कोई रीत नहीं होती।
कपूर जले तो खुशबू बनकर, राख बने तो क्या हासिल,
जीवन की लौ बाँटने से ही जीवन की प्रीत सही होती।
बंधन भी कुछ टूटेंगे और पहरे भी ढह जाएँगे,
सूखे मन के आँगन में फिर बादल घिर आएँगे।
दरियापन थोड़ा जगाना है, बस इतनी-सी ज़िद बाकी,
हम उसके सपने नहीं छीनेंगे… उसको सपने लौटाएँगे।
-रतन कुमार कैथवास