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बहुत कठिन ये प्रश्न तुम्हारा, उत्तर से कतराया क्यों

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            पत्थर दिल फिर टूटा क्यों, जग से नाता छूटा क्यों,
        
                                                    
                            
जिसको अपना मान लिया था, वही अचानक रूठा क्यों।
नस-नस में तेज़ लहू दौड़े, आँखों में अंगार जले,
भीतर इतना शोर मचा तो, होंठों पर सन्नाटा क्यों?

भीतर के झंझावातों में बादल से बादल टकराए क्यों,
मन के सूने आकाश में बिजली बनकर दर्द समाए क्यों।
कौन-सी आग धधक रही है, कौन-सा तूफ़ान पलता है,
बूँद-बूँद जब आँखें बरसें, सीने में सैलाब उठे क्यों?

बड़ा कठिन ये प्रश्न तुम्हारा, उत्तर से कतराया क्यों,
सच की चौखट सामने आई, फिर तूने नज़र चुराया क्यों।
अपने ही मन की कोर्ट में ख़ुद को दोषी पाया क्यों,
जिस सच से दुनिया डरती है, उससे तू घबराया क्यों?

कब तक अपनी पीड़ा को तू हँसी के पीछे ढाँपेगा,
कब तक अपने टूटे सपनें लेकर ख़ामोशी में काँपेगा।
ज्वालामुखी का लावा लेकर कब तक शांत दिखाई देगा,
भीतर जब सब बिखरा-बिखरा, बाहर कैसे चमकेगा?

उठ, अपने अंतर्मन से अब आँख मिलाकर बात कर,
टूटे हुए विश्वासों से फिर जीने की शुरुआत कर।
पत्थर भी दरक जाते हैं जब चोट निरंतर पड़ती है,
जो अपने प्रश्नों से लड़ता है, उसकी ही सुबह निखरती है।
-रतन कुमार कैथवास
2 घंटे पहले
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