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बाहर - भीतर चमक रहा

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अम्बर सोना, धरती चाँदी, माटी हीरा-मोती,
        
                                                    
                            
बाहर-भीतर चमक रहा है, सब तेरे आकाश की ज्योति।
भोर ने जब पहली किरण से खेतों का माथा चूमा,
ओस की हर बूँद में जैसे सूरज ने अपना घर बना लिया।
किसान ने हथेली भर मिट्टी उठाकर मुस्कुराते हुए कहा,
"जिसे लोग धूल समझते हैं, उसी ने मेरा जीवन सँभाल लिया।"
नदी पहाड़ से उतरी तो उसके पाँव में कोई गहना न था,
फिर भी हर मोड़ पर उसका सौंदर्य बढ़ता ही गया।
समंदर ने पूछा, "तेरे पास इतना वैभव कहाँ से आया?"
वो बोली, "मैंने रास्ते भर बाँटना सीखा, बस यही धन साथ रहा।"
एक कुम्हार ने उसी माटी से दीप बनाया,
दूसरे ने उसी से घड़ा गढ़ा,
तीसरे ने उसी माटी को माथे से लगाया और बोला…
"जिस मिट्टी में जन्म लिया, उससे बढ़कर कोई ख़ज़ाना नहीं।"
शहर के बाज़ार में लोग सोने-चाँदी का मोल पूछते रहे,
गाँव की दादी तुलसी में जल चढ़ाकर मुस्कुराती रही।
वो बोली…
"जिस घर में प्रेम बचा हो, वहाँ हर दिन दीपावली होती है,
और जहाँ मन उजड़ जाए, वहाँ महल भी सूने लगते हैं।"
साँझ ढली तो गोधूलि ने आसमान पर रंग बिखेर दिए,
पक्षी लौटे, बच्चों की हँसी आँगन में गूँज उठी।
तब लगा, असली चमक सूरज की नहीं,
उन चेहरों की है जो एक-दूसरे का इंतज़ार करते हैं।
तभी एक साधु ने मुस्कुराकर कहा…
"धन बाहर की चीज़ नहीं, देखने की दृष्टि है।
जिसकी आँखों में कृतज्ञता उतर जाए,
उसे कंकड़ में भी प्रभु का स्पर्श दिखाई देता है।"
अम्बर सोना, धरती चाँदी, माटी हीरा-मोती,
बाहर-भीतर चमक रहा है, सब तेरे आकाश की ज्योति।
जिस दिन मन का अँधियारा हट जाएगा,
उस दिन समझोगे…
सारा ब्रह्मांड पहले से ही उजाला था,
रोशनी की कमी नहीं थी, बस नज़र की खिड़की बंद थी।
-रतन कुमार कैथवास
3 महीने पहले
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