पता नहीं क्यों,
वो मुझसे हमेशा नाराज़ रहती है,
लगता है जैसे,
हर बात मेरे ख़िलाफ़ जा रही है।
मगर फिर, किसी बुज़ुर्ग की बात याद आती है…
औरतें यूँ ही, झट से बाग़ी नहीं बनतीं,
वे पहले बहुत देर तक, रिश्ता बचाती हैं।
पहले वह ख़ामोश होती है,
फिर समझाती है,
फिर इंतज़ार करती है
कि शायद तुम, बिना कहे समझ जाओ।
वह अपनी नाराज़गी,
हर रोज़ नहीं दिखाती…
कई बार उसे, चाय की प्याली में घोल देती है,
कई बार मुस्कान के पीछे, छिपा देती है,
और कई बार रात के तकिए में, रखकर सो जाती है।
जब उसे लगता है,
कि उसकी बातों से ज़्यादा,
उसकी चुप्पियाँ बोलने लगी हैं…
तब लोग कहते हैं,
"देखो, वो तो बदल गई है।"
नहीं…
वो एक दिन में, नहीं बदली,
वह तो हर दिन, थोड़ा-थोड़ा टूटती रही,
और तुम उसे,
हर बार, पहले जैसा ही समझते रहे।
मैंने अपने दिल से कहा…
फ़ैसला सुनाने से पहले,
कारण भी सुन लेना,
क्योंकि रिश्तों की, अदालत में,
सिर्फ़ अपनी, गवाही काफ़ी नहीं होती।
हो सकता है,
वह मुझसे नहीं,
मेरी किसी आदत से नाराज़ हो।
हो सकता है,
उसे शिकायत, मेरी ख़ामोशी से हो,
मेरे लहजे से हो,
या उस अनकहे वादे से,
जो मैंने, कभी निभाया ही नहीं।
इसलिए अब सोचता हूँ…
नाराज़गी का जवाब,
बहस से नहीं,
समझ से, देना चाहिए।
क्योंकि अक्सर,
औरतें बाग़ी नहीं होतीं,
उन्हें बाग़ी, बना दिया जाता है।
और जिस दिन,
उनकी उम्मीद, आख़िरी साँस ले लेती है,
उस दिन, उनकी आवाज़ नहीं बदलती…
बस उनके, इंतज़ार का दरवाज़ा,
हमेशा के लिए, बंद हो जाता है।
-रतन कुमार कैथवास