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अपना सावन माँग रहा

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            शीतल मन कुछ चाह रहा है, सपनों की आँधी से शायद,
        
                                                    
                            
अपना सावन माँग रहा है, बीते मौसम की बाँहों से शायद।
बरगद के इस छाँव तले अब चाय की चुस्की पी ले,
मन भी थोड़ा ठहर जाएगा, इस भागती हुई राहों से शायद।

पत्तों पर ठहरी बूँदों से कुछ पुरानी बात करें,
मिट्टी की सौंधी खुशबू में फिर कोई बरसात करें।
दुनिया भर की आपाधापी को थोड़ी देर किनारे रख,
आज हवा के संग बैठें, और दिल की बात करें।

दूर कहीं कोयल कूके, जैसे कोई गीत सुनाए,
नदी किनारे बैठा सूरज धीरे-धीरे घर को जाए।
हम भी अपने हिस्से का थोड़ा सुकून बटोर लें,
कौन जाने फिर ये मौसम कब लौटकर आए।

कुछ ख़्वाब अभी पलकों पर हैं, उनको भी पलने दें,
कुछ अधूरी इच्छाओं को आज ज़रा संभलने दें।
ज़िंदगी बहुत दौड़ चुकी है मंज़िल की तलाश में,
आज उसे बरगद की छाँव में बैठकर थोड़ा ठहरने दें।

चाय की प्याली गरम रहे और बातें होती जाएँ,
बीते दिनों की धूल हटे, कुछ यादें मुस्कुराएँ।
कल की फ़िक्र कल करेंगे, आज को आज ही जी लें,
सावन माँगता है मन तो, सावन बनकर लौट चलें।

शीतल मन जो माँग रहा है, उसको थोड़ा मान भी ले,
सूखे मौसम के बीच कोई बादल अपनी पहचान भी दे।
बरगद की इस छाँव तले बस इतनी-सी चाहत है…
चाय रहे, तुम पास रहो, और उसको तो अपना आसमान भी दे।
-रतन कुमार कैथवास
एक महीने पहले
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