औरों से मिलने में दुनिया मस्त,
पर ख़ुद से मिलने की,
सारी लाइनें व्यस्त।
यक़ीन न हो,
तो अपने मोबाइल से,
अपना नंबर लगाकर देखो।
"The number you are calling is busy..."
टूँट... टूँट... टूँट...
मैंने सचमुच,
एक दिन ऐसा ही किया।
मोबाइल हाथ में था,
नंबर भी मेरा ही था,
लेकिन अचानक लगा...
जिस आदमी को फ़ोन लगा रहा हूँ,
वो बरसों से,
मुझसे बात ही नहीं कर रहा।
मैंने आँखें बंद कीं।
उधर से कोई आवाज़ नहीं आई,
बस एक अजीब-सी ख़ामोशी थी।
तभी जैसे भीतर से किसी ने पूछा…
"कौन बोल रहे हैं?"
मैंने कहा…
"मैं..."
फिर कुछ देर चुप रहा।
क्योंकि एहसास हुआ,
मैं अपना नाम तो बता सकता हूँ,
लेकिन अपना हाल नहीं।
उधर से फिर आवाज़ आई…
"इतने दिनों बाद?
याद कैसे आ गई?"
मैंने कहा,
"बस...
ज़िंदगी में बहुत लोगों से मिलता रहा,
सोचा आज ख़ुद से भी मिल लूँ।"
वो हल्का-सा हँसा।
बोला…
"मिलना चाहते हो,
या सिर्फ़ हालचाल पूछकर चले जाओगे?
क्योंकि आख़िरी बार जब मिले थे,
तब तुमने कहा था…
'अभी बहुत काम है,
बाद में बात करेंगे।'
और वो 'बाद में',
आज तक नहीं आया।"
मेरे पास कोई जवाब नहीं था।
मैंने धीरे से पूछा…
"नाराज़ हो?"
भीतर से आवाज़ आई…
"नाराज़ नहीं...
बस इंतज़ार करते-करते,
चुप हो गया हूँ।"
मैंने मोबाइल की स्क्रीन बंद कर दी।
बाहर नेटवर्क पूरा था,
लेकिन अंदर,
सिग्नल बहुत कमज़ोर था।
उस दिन समझ आया,
सबसे मुश्किल मुलाक़ात,
किसी अजनबी से नहीं,
अपने आप से होती है।
हम दुनिया भर के मैसेज का जवाब दे देते हैं,
लेकिन अपने दिल के,
एक नोटिफ़िकेशन को,
महीनों तक 'Unread' छोड़ देते हैं।
इसलिए अगर कभी,
ज़िंदगी बहुत शोर करने लगे,
तो पाँच मिनट,
अपने भीतर फ़ोन लगाकर देखना।
अगर उधर से सिर्फ़,
टूँट... टूँट... टूँट...
की आवाज़ आए,
तो समझ जाना…
नंबर व्यस्त नहीं है...
तुमने ख़ुद से मिलने का वक़्त ही तय नहीं किया।
और जिस दिन,
भीतर से आवाज़ आए…
"हाँ, बोलो... कब से तुम्हारा इंतज़ार था।"
समझ लेना,
उस दिन तुम्हें,
दुनिया का सबसे सच्चा दोस्त
मिल गया है।
-रतन कुमार कैथवास