उसके अफ़साने आज भी, दोस्तों की महफ़िलों में ज़िंदा हैं।
वह गुस्सा भी करता था, रूठता भी था,
मगर उसके दिल का रास्ता,
हमेशा रिश्तों की चौखट से, होकर गुज़रता था।
एक बार की बात है...
बात छोटी-सी थी,
मगर लफ़्ज़ बड़े हो गए थे।
आवाज़ें ऊँची हुईं,
अहम भी बीच में आ खड़ा हुआ।
वह बिना पीछे देखे उठकर चला गया।
हमने भी सोचा…
"अब शायद कई दिनों तक मुलाक़ात नहीं होगी।"
शाम ढली...
रसोई से दाल में तड़के की ख़ुशबू आने लगी।
थालियाँ सज गईं,
मगर चौकी के चारों ओर,
सन्नाटा बैठा हुआ था।
तभी दरवाज़े पर धीमी-सी दस्तक हुई।
हमने देखा…
वही था।
चेहरे पर अभी भी रूठने की हल्की रेखाएँ थीं,
मगर आँखों में गुस्से से ज़्यादा अपनापन था।
अंदर आते ही बोला…
"अरे... तुम लोग अभी तक खाए नहीं?"
किसी ने जवाब नहीं दिया।
वह पास आकर बैठ गया और मुस्कुराने की कोशिश करते हुए बोला…
"यार, तुम लोग गुस्से में खाना नहीं खा रहे हो…
तो मुझसे भी खाना नहीं खाया जा रहा।
कौर हलक से उतर ही नहीं रहा है।
दिल बार-बार यहीं आकर अटक जाता है।
बताओ... अब मैं क्या करूँ?"
बस...
इतना सुनना था कि,
सारी नाराज़गी पानी की तरह बह निकली।
किसी ने थाली उसकी ओर खिसका दी,
किसी ने दाल में घी डाल दिया,
किसी ने हँसकर कहा…
"पहले तू बैठ,
बाक़ी हिसाब बाद में करेंगे।"
उस रात दाल का स्वाद,
किसी पाँच सितारा दावत से भी बढ़कर था।
क्योंकि उसमें मसाले कम,
मोहब्बत ज़्यादा पकी थी।
आज जब दोस्त मिलते हैं,
तो उस झगड़े का ज़िक्र कोई नहीं करता,
मगर उसकी वह बात,
हर किसी की ज़ुबान पर आ ही जाती है…
"तुम लोग गुस्से में खाना नहीं खा रहे हो,
तो मुझसे भी खाना नहीं खाया जा रहा..."
तब समझ में आया…
रिश्ते जीतने वाले लोग,
बहस नहीं जीतते,
वे भोजन की एक थाली बचाने लौट आते हैं।
जो इंसान अपनी भूख से पहले,
अपनों की रोटी की फ़िक्र करे,
उसके हिस्से में इज़्ज़त उम्र भर आती है।
आज वह साथ नहीं बैठता,
मगर उसकी आदतें, अब भी हमारी मेज़ पर बैठी हैं।
जब भी कोई रूठकर उठता है,
हममें से कोई मुस्कुराकर कह देता है…
"चलो उसे बुला लाओ...
कहीं ऐसा न हो कि,
आज फिर किसी का कौर
हल्क से उतर न रहा हो।"
-रतन कुमार कैथवास