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अभी मुझे पहचाने नहीं हैं

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मंज़िल की परवाह है मुझको, पर रास्ते आसान नहीं हैं,
        
                                                    
                            
बढ़ी हुई दरिया को पार कर पाना आसान नहीं है।
मेरे मुद्दे तुम क्या जानो, जब आग लगी हो सीने में,
बाहर से शांत दिखूँ तो क्या, हालात मेरे आसान नहीं हैं।

पत्थर से टकराकर भी मैंने, लहरों का रुख मोड़ा है,
जिसने दर्द सहा हो मुझसा, उसके हौसले वीरान नहीं हैं।
काँटों पर चलना सीखा है, तब जाकर ये कदम बढ़े हैं,
मेरे पैरों के ये छाले कोई, यूँ ही मिले निशान नहीं हैं।

तूफ़ानों ने बहुत कहा मुझसे, लौट चलो अब राहों से,
मैंने हँसकर कह दिया उनसे, मेरे इरादे अनजान नहीं हैं।
हार अगर मिल जाए मुझको, तो भी शिकवा नहीं होगा,
मेरी लड़ाई सिर्फ़ जीत की, मेरे अपने अरमान नहीं हैं।

जो आग लगी है सीने में, वो राख नहीं बनने दूँगा,
जब तक साँसें बाकी हैं मेरी, सपने बेईमान नहीं हैं।
मंज़िल चाहे दूर खड़ी हो, मैं रास्ता बनाता जाऊँगा,
मैं रुक जाऊँ… ऐसा सोचने वाले, अभी मुझे पहचाने नहीं हैं।
-रतन कुमार कैथवास
एक महीने पहले
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