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आराम नहीं, चुनौती चुनो

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आला दर्जे की ज़िद रखो,
        
                                                    
                            
कोई भी कमाल, कम्फर्ट ज़ोन में रहकर नहीं होता।
जो अपनी बनाई हुई हदों में कैद रहे,
उसका मुक़द्दर कभी आसमान नहीं छूता।
एक दिन मैंने देखा,
एक छोटा-सा चील का बच्चा,
पहाड़ की सबसे ऊँची चट्टान पर, बैठा काँप रहा था।
उसकी माँ बार-बार उसे किनारे तक लाती,
और फिर पीछे हट जाती।
मैंने सोचा…
कैसी माँ है,
बच्चे को धक्का क्यों दे रही है?
पास खड़े एक चरवाहे ने मुस्कुराकर कहा…
"उड़ना सिखाना हो,
तो घोंसले की मोहब्बत छोड़नी पड़ती है।
जो हमेशा सुरक्षित रहेगा,
वो कभी आसमान का मालिक नहीं बनेगा।"
उस दिन समझ आया,
डर सबसे बड़ा पिंजरा है,
और कम्फर्ट ज़ोन उसकी सबसे मज़बूत सलाख।
लोहे को तलवार बनने के लिए,
आग से गुज़रना पड़ता है।
बीज को दरख़्त बनने के लिए
मिट्टी का सीना चीरना पड़ता है।
नदी को समंदर मिलने के लिए
चट्टानों से टकराना पड़ता है।
फिर इंसान क्यों सोचता है
कि बिना संघर्ष के शिखर मिल जाएगा?
ज़िद ऐसी रखो,
कि थकान तुम्हें रोकने से पहले,
खुद थक जाए।
हर सुबह अपने आप से कहना…
"आज मैं कल वाली सीमाएँ तोड़ूँगा।
आज मैं अपने डर से बड़ा बनूँगा।"
याद रखना,
इतिहास उन लोगों का नहीं लिखा जाता,
जो आरामकुर्सी पर बैठकर, सपने देखते रहे।
इतिहास उन्हीं का लिखा जाता है,
जिन्होंने अपने ही, बनाए हुए घेरे तोड़ दिए।
इसलिए...
आला दर्जे की ज़िद रखो,
आराम नहीं, चुनौती चुनो।
क्योंकि मंज़िलें पैरों की ताक़त से नहीं,
इरादों की आग से जीती जाती हैं।
और जो अपना घेरा तोड़ देता है,
दुनिया एक दिन उसी की बनाई हुई लकीरों में चलती है।
-रतन कुमार कैथवास
2 महीने पहले
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