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लाशों पर मीनार

rashmi gupta

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            शर्म करो ऐ नेता हस्ती,
        
                                                    
                            
मिटा डाली है तुमने हर घर की गस्ति,
जनता का दर्द भूल कर
छाई है जो मिनारो की मस्ती।

लाशों के तुम खेल न खेलो,
उनकी कीमत है नही नही इतनी सस्ती,
वक्त जब आयेगा तो दिखा देंगे हम भी,
हमसे ही है तुम्हारी ये श्रृष्टि।

तुम भूल गए हो शायद,
हमारी मेहरबानी ही ,
तुम पर तरस खाई है ,
मेरी मां की मिट्टी से ही,
तुने ये दीवार सजाई है।

फर्ज अपना भूल गए हो शायद
जो घर बनाने चले हो,
शमशान के राख से,
की राख से दीवार सजाने चले हो।

शर्म करोगे उस दिन तुम,
जिस दिन वक्त वो आयेगा,
त्राहि त्राहि तुम करोगे
और जनता बिगुल बजाएगा।

शर्म करो ये नेता हस्ती,
लाशों के मीनार बनाने पर,
जनता भी दिखला देगी,
उसका समय आने पर।
2 वर्ष पहले
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