यही है हमारे पुरुषवादी समाज का आईना,
गली-गली में घूम रहा रावण,
और रोकने वाला कोई ना |
हज़ार नज़रों से रोज़ होता उस पर वार है,
कभी इज़्ज़त तार-तार है,
कभी सौंदर्य को ठहराया ज़िम्मेदार है |
बीमार मानसिकता की यहाँ,
मिसालें बेशुमार हैं,
कहीं निर्भया, तो कहीं कठुआ वाला कांड है |
दरिंदगी की अब कोई सीमा नहीं रही,
इंसानियत भी शर्मसार है,
क्या जीन्स-टीशर्ट, क्या सलवार-कमीज,
अब तो फ्रॉक में बच्चियां भी शिकार है |
विडंबना देखिये..!!
जुर्म करने वाले,
घूम रहे आज़ाद,
ऊपर से दबाव है भाई !!!
हो ना रही कोई जाँच |
बेख़ौफ़ घूम रहा सड़कों पर दुर्योधन है,
समझे सबको द्रौपदी,
अब तो चीरहरण हर क्षण है |
कानून ने पहन रखी,
आँखों पर काली पट्टी है,
पुलिस का खौफ अब तो मुजरिमों में,
मिट्टी-मिट्टी है |
चलेंगे मामले अदालतों में सालों साल,
न्याय मिलने की प्रतीक्षा में,
हो जाएगी एक उम्र पार |
यही है हमारे पुरुषवादी समाज का आईना,
गली-गली में घूम रहा रावण,
और रोकने वाला कोई ना |
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