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एक अभ्यर्थी की तपस्या

Ranjeet Panday

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जब शहर की बत्तियाँ सो जाती हैं, तब भी मैं जाग रहा होता हूँ,
        
                                                    
                            
किताबों की सूनी चौखट पर अपना कल माँग रहा होता हूँ।

हर पन्ना मुझसे पूछ रहा—“क्या इतना धैर्य बचा होगा?”
मैं मुस्काकर लिख देता हूँ—“अभी सफ़र अधूरा होगा।”

नोट्स, अख़बार, मानचित्रों में दिन का सूरज ढल जाता है,
एक प्रश्न अनुत्तरित रह जाए तो मन भीतर जल जाता है।

मित्र सभी अपनी राहों पर मंज़िल पाकर बढ़ते जाते,
मैं अब भी संविधान के पन्नों में अपने दिन गिनते जाते।

कभी प्रिलिम्स की धूल उड़ाती, कभी मेन्स का पर्वत आता,
कभी साक्षात्कार की खिड़की से अपना ही चेहरा घबराता।

घर से जब भी फ़ोन उतरता, स्वर में विश्वास बहुत होता,
“बेटा, मेहनत करते रहना”—इतना कहना ही पर्याप्त होता।

उन शब्दों का ऋण ही मुझको फिर से पुस्तक खोलने देता,
टूटी हुई प्रत्येक उम्मीद को फिर से बोलने देता।

कितनी रातें यूँ ही बीतीं, नींद किनारे बैठी रही,
आँखों में भारत का सपना, मेज़ पर चाय ठंडी रही।

कभी लगा—यह राह नहीं है; कभी लगा—बस यहीं सवेरा,
फिर भी मन ने हार न मानी, थामा अपना सत्य सवेरा।

मैं जानता हूँ, यह परीक्षा केवल प्रश्नों की पंक्ति नहीं,
यह अपने भीतर के भय से प्रतिदिन होने वाली युद्धिनी।

जो गिरकर भी उठते रहते, वही इतिहास रचाते हैं,
जो आँसू पीकर पढ़ते हैं, वही परिणाम बनाते हैं।

यदि इस वर्ष भी नाम न आए, तो इतना विश्वास रहेगा—
मेरी साधना व्यर्थ न जाएगी, संघर्ष ही प्रकाश रहेगा।

एक दिन यही पुस्तकालय, यही धूल, यही एकांत, यही क्षण,
मेरे जीवन का सबसे सुंदर और पावन होगा स्मरण।

तब लोग कहेंगे—“भाग्य प्रबल था”; मैं केवल इतना कह दूँगा—
भाग्य नहीं, अनगिन रातों का मौन तप ही मेरा धन था।
तब लोग कहेंगे—“भाग्य प्रबल था”, मैं बस मुस्काकर रह जाऊँगा,
इन सूनी जागी रातों का इतिहास कहाँ समझा पाऊँगा।

किसने देखा वह दीप अकेला, जो आँधी में भी जलता था,
किसने जाना वह मौन हृदय, जो भीतर-भीतर गलता था।

किसने गिने वे टूटे सपने, जो तकिए में दफ़्न हुए,
किसने पढ़े वे भीगे पन्ने, जो आँसू से लिखे गए।

जब सब उत्सव में खोए थे, मैं प्रश्नों से संवाद लिए,
हर उत्तर में जीवन बोया, हर संकल्प में प्राण दिए।

यह मंज़िल यूँ ही मिलती तो पथ इतना वीरान न होता,
हर मुस्कान के पीछे इतना लंबा श्मशान न होता।

जो दिखता है वह फल भर है, जड़ का तप कौन बताएगा?
इस ऊँचे वृक्ष की पीड़ा का विस्तार कौन बताएगा?

यदि शिखर मिला तो याद रहे—यह केवल मेरी जीत नहीं,
माँ की प्रार्थना, पिता का श्रम, और वर्षों की संगीत नहीं।

भाग्य नहीं, यह समय-साधना का नीरव अर्जन होगा,
हर ठोकर का, हर आँसू का चुपचाप समर्पण होगा।

तब लोग कहेंगे—“भाग्य प्रबल था”, मैं फिर सिर झुकाकर कह दूँगा—
भाग्य नहीं, अनगिन संघर्षों का संचित प्रकाश ही मेरा धन था।
2 महीने पहले
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