बहुत आगे निकल चुके हैं,
कुछ रिश्तों की कश्मकश से।
लौटकर क्यों मिलें दोबारा,
उस दमघोंटू जकड़न से।
अब उन्मुक्त, स्वच्छंद हैं हम,
भरते उड़ान अपनी मर्ज़ी से।
फ़ुर्सत के कुछ पल अपने नाम,
रात भर बातें चाँद-तारों से।
आज़ाद किया, अब वो जिएँ-हँसें,
दूर कहीं हमारी नज़रों से।
ना शिकवा रहे, ना याद आए,
जो हुआ, हुआ उसकी मर्ज़ी से।