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इश्क़ की तासीर

Ranjana Sood

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हम बेज़ुबान हरगिज़ नहीं थे,
        
                                                    
                            
पर दिल की बात कही न गई,
आमना-सामना हुआ जब उस शख़्स से,
लबों पर आकर हर बात लड़खड़ा सी गई।

कैसे कहती मैं, जो इश्क़ का ख़ुमार छुपा था,
जज़्बातों का तूफ़ान आँखों में थमा था,
कैसे बताती कि दिल कितनी ज़ोर से धड़क उठा,
जब उनके सामने दिल बेख़ुदी में आ गया।

हाल-ए-दिल देख वो भी ज़रा शरमाए,
फिर मोहब्बत की तासीर से खिंचे चले आए,
मफ़हूम एक ही था पहले भी और अब भी,
सदक़ा उन नज़रों का, जिन्होंने सब पढ़ लिया।

ज़िंदगी की किताब का नया पन्ना खुल गया,
न वो तन्हा रहे, न हम अकेले—
इश्क़ का अधूरा फ़साना मुकम्मल हो गया!
2 महीने पहले
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