ज़िंदगी की शाम
करीब आ रही,
बढ़ती उम्र की बेहिसाब
ज़रूरतें सर उठा रही।
बेताबी साथी की
कुछ ज़्यादा बढ़ती जा रही,
काश! साथ का सफ़र
और नसीब हो जाए।
बे-लगाम जीना
किसे कहते, अब समझ पा रही,
चाय गर्म हो या ठंडी,
तपिश दे जा रही।
पुरानी फ़िल्में देखते,
रुबाई बनाई जा रही,
फुर्सत ही फुर्सत में
बिसात बिछाई जा रही।
हर पिछला हिसाब
ठुकराया जा रहा,
रोज़ नए सिरे से
हर दिन नई किताब लिखी जा रही।