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अपने आकाश में

Ranjana Sood

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आज फिर मुस्कुराने को जी चाहता है,
        
                                                    
                            
जी भर गुनगुनाने को जी चाहता है।

बंदिशों में बँधकर बहुत देख लिया,
अब खुली वादियों में उड़ना चाहता है।

जो अपने-पराए का फैला जाल है देखा,
उस फड़फड़ाहट से मुक्त होना चाहता है।

वो फूल जो हमने सदियों से नहीं देखे,
आज उनकी ख़ुशबू में महकना चाहता है।

किताबों में देखी थीं पंछियों की तस्वीरें,
उन्हें हथेली पर बिठा सहलाना चाहता है।

अपने बड़े जो उड़ चुके विलीन होकर,
उनसे फिर वही खोया लाड़ चाहता है।

इतनी फ़रमाइशें करता है ये दिल कभी,
कैसे समझाएँ—हाथ-पाँव मारता है।

हर बंधन, हर फ़िक्र से दूर,
बस अपने ही आकाश में उड़ना चाहता है।
2 महीने पहले
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Manju Sharma

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