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एक ख़्वाब

Rani

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एक ख़्वाब था मेरा…
        
                                                    
                            
एक घर हो हमारा, जिसे मैं अपने हाथों से सजाऊँ…
जिसमें हो हम, हमारा परिवार और हमारा प्यार…
एक छोटी-सी दुनिया हो हमारी,
उस दुनिया में तुम हो और हो हमारा बेशुमार प्यार…
एक कमरा हो हमारा,
उसमें हो बड़ी-सी तस्वीर तुम्हारी…
मेरे दिन की शुरुआत तुम्हारे मासूम-से चेहरे से हो,
और मेरी रातें तुम्हारी बाँहों के घेरे में सिमट जाएँ…
कहा ना… एक ख़्वाब था…
जो बस ख़्वाब ही रह गया…
लेकिन सुनो…
अगर इजाज़त हो तुम्हारी,
तो एक तस्वीर चुरा लूँ क्या?
नहीं हो सकते तुम मेरे,
तो तुम्हारी ज़िंदगी का एक लम्हा चुरा लूँ क्या?
एक घर मैं अब भी बनाऊँगी…
उस घर में एक बड़ी-सी तस्वीर तुम्हारी होगी।
तुम साथ नहीं होगे,
फिर भी हर कोने में यादें तुम्हारी होंगी…
न परिवार होगा,
न प्यार होगा,
न तुम मेरे साथ होगे वहाँ…
फिर भी अपने उस ख़्वाब को मुकम्मल करूँगी मैं,
बस तुम्हारी यादों के साथ…
तुम नहीं होगे,
पर तुम्हारी यादें होंगी मेरे साथ।
हाँ, माना… कोई नहीं होगा मेरे साथ,
फिर भी मैं और मेरा प्यार
हर वक़्त होगा मेरे साथ…
उस घर की ख़ामोशी में
तुमसे लंबी-लंबी बातें करूँगी…
तुम्हारी तस्वीर से तुम्हारी शिकायतें करूँगी,
फिर ख़ुद ही मुस्कुराकर
तुम्हें मना भी लूँगी…
कभी तुम्हें याद करके रोऊँगी,
कभी तुम्हारी यादों में हँसूँगी…
और हर बार ख़ुद से यही कहूँगी—
तुम मेरे नहीं हो सके,
लेकिन मेरा ख़्वाब तो मेरा था…
और उसे जीने का हक़
मुझसे कोई नहीं छीन सकता।
तुम साथ नहीं होगे,
फिर भी तुम्हारा एहसास रहेगा…
तुम मेरे पास नहीं होगे,
फिर भी मेरा हर ख़ामोश लम्हा
तुमसे ही कुछ कहता रहेगा…
शायद यही मेरा अधूरा-सा प्यार होगा…
जिसमें तुम नहीं,
बस तुम्हारी यादें होंगी…
और मैं…
अपने उसी छोटे-से घर में,
तुम्हारी तस्वीर के सामने बैठकर
हर रोज़ एक ही बात कहूँगी—
“देखो…
कहा था ना, एक ख़्वाब था मेरा…
तुम नहीं रहे,
फिर भी मैंने उसे ख़्वाब ही नहीं रहने दिया…”
2 महीने पहले
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Manju Sharma

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