आज यादों ने मुझे सचमुच में रुला दिया।
बचपन के पैरो तले की दूब भी क्या खूब थी,
मखमल सी चुभन न घुटन न ऊब थी,
थे तो बस पेड़ो के टहनियों से लटकते सपने,
डुबकीओं में खेलते मस्त दोस्त सब थे अपने।
अब तो गांवों में भी वो पगडण्डी कहीं खो गयी,
नदी में अठखेलती रेत भी न जाने कहीं सो गयी,
सड़क में अब वो मोड़ ढ़लान कहां,
एड़ी तक धूल मिट्टी का मिलान कहां ?
तब ठंढ़ी हबा बस पिपल बर के छांव देते थे,
जमघट समेटे सभी एक-दूसरे को भाव देते थे,
सवालों के हल , रोगों का इलाज होता था,
यहां निशचिंत होके बूढ़ा जवान सोता था।
शान दरबाजे पर, प्रकृति आंगन की शोभा थी,
पगरी और घुंघट में चमक और आभा थी ,
लाज-धरम , दया- दरेग के बहुत मुल्य थे,
काका-काकी,भैया-भावी,मां-बाप के तुल्य थे।
अब चौबटिया मूक-बधिर सा सरकस देख रहा,
नदी तालाब के घाटो पर कूरा-करकट फेंक रहा,
यादों में सरगम सी टमटम की चालें,
खूब मजे में धंटी बजाते साइकिल वाले।
नये पैरहन का उत्सव होता था हफ्तों तक,
मलमल,मटका,मारकीन खद्धर,के तख्तो तक,
कोएले बाली इस्त्री की गमक कि किसको याद है,
पानी की छींटों से उठता धूंआ का कुछ अंदाज है।
उन पलथियों को ढ़ूढ़ता है आज भनसाघर सभी,
परसन लिये मांओं की आंखों को तरसाकर कभी,
दूध के खोए के स्वाद जीभ कैसे भूला दिया,
आज यादो ने मुझे, सचमुच में रूला दिया।