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साँझ का दीपक

Ramnath Yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            साँझ का दीपक
        
                                                    
                            

जल उठता है
कोठरी के एक कोने में
अपनी मद्यम लौ के साथ
साँझ का दीपक।

अपने आँचल के
एक कोर से माँ
इस दीपक पर जमें गर्द को
हर शाम साफ करती है।

जलता है यह दीपक
साँझ से देर रात तक
अपनी ही रौ में
बिखेरता है आलोक
हरता है अंधकार।

ठीक वैसे ही जैसे
हमारे जीवन के अंधकार को
हरते हैं पाठशाला में गुरुजन
घर में माता-पिता
और हर कदम पर
भाग्य-नियंता।

 रामनाथ बेख़बर


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