बुद्धि के सहारे,
मैं ईश्वर को ढूंढने चला,
आगे बढ़ा, दूर तक चला,
और यह निश्चय हुआ कि
ईश्वर नहीं है,
फिर बुद्धि के सहारे,
मैं स्वयं को ढूंढने चला,
आगे बढ़ा, दूर तक चला,
और यह निश्चय हुआ कि
मैं भी नहीं हूं,
और फिर मैं बुद्धि के सहारे,
प्रेम को ढूंढने चला,
जल्द ही यह स्पष्ट हो गया कि
प्रेम सभी जगह एक समान रूप से मौजूद है|
किंतु इस बुद्धि में,
इतनी बुद्धि नहीं है कि
वह प्रेम को जरा भी स्पर्श कर सके|
-मनस्व