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मुक्तक विन्यास में तेवरी

Ramesh Raj

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            धर्म के ये स्वर नये
        
                                                    
                            
और फुँकने घर नये।
आजकल उन्माद के
उग रहे हैं पर नये।।

देख बाजीगर नये
दैत्य दूषण खर नये।
कर रहे हैं विषवमन
आज के शंकर नये।।

आज ये मंजर नये
बढ़ रहे हैं डर नये।
क्रूर कामी लालची
बन गये रहबर नये।।
 
12 घंटे पहले
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