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टूट सपने रुठे अपने

Ramana nd

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                               घन घोर तिमिर आया जीवन, में मैंने दीप जलाना चाहा तो 
        
                                                    
                            
बारिस होने लगी गगन में।
मैं बढ़ा जब ही पथ पर चपला टड़पी  जोर गगन मे
मानो आग लग गयी हो सपनों के घर में
अपने हो गये सब सपने  टूटे सपने रुठे अपने ।
मैं बाधाओं मे जब ही फंसा , मुझको देख के जगत हँसा।
जैसे बारिस होती गगन में ,   हरषाते हैं मेढक  मन में।
ऐसे ही सब जग हरषाया ,   जब ईश ने पावस दुःख बरसाया ।
वो भी हसे जो थे अपने    टूटे सपने रुठे  अपने।
जब सबने ही मुख मोड़ लिया , अपनो ने नाता तोड़ दिया
जो माली देता नीर सुमन को , उसने ही बगीचा छोड़ दिया
कोई न पास आया मेरे , बस चारों ओर अंधेरे ही अंधेरे
प्रतिकूल हुए जो थे अपने, टूटे अपने रुठे अपने।
फिर भी मैं न हुआ उदास , रखका ईश पर अटल विश्वास
मैंने धैर्यै विश्वास न खोया ,अंधेरे में भी रास्ता पाया
बाधाओं को अपना दास बनाया, साहस से कदम को आगे
बढ़ाया , होगे अनुकूल प्रतिकूल थे जितने, टूटे सपने रुठे अपने ।
जो बाधाओं मे फसते है, लोग उन्ही पर हँसते है।
वीर तो आगे बढ़ते हैं, क्या फर्क  लोग जो हसते है।
जो साहस से बढ़ते हैं आगे, पर्वत भी झुकते उसके आगे
पूरे करते सपने अपने , टूटे सपने रुठे अपने।।
                                                
3 महीने पहले
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