विज्ञापन

दीप जलता रहा

Ramakant Chaudhary

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            चल पड़ा कारवां फिर रुका ही नहीं।
        
                                                    
                            
तानाशाहों के आगे झुका ही नहीं।

लाख कोशिश करी लाख टोटके किए,
उसका जादू सभी पर चला ही नहीं।

आँधियाँ शर्म से मुँह छुपाने लगीं,
दीप जलता रहा वह बुझा ही नहीं।

मोटी जंजीर जिसके गले में पड़ी,
उसके अंदर का इंसाँ जगा ही नहीं।

जिसके सीने में जज़्बा बग़ावत का हो,
लाठियों से कभी वह मरा ही नहीं।

चाहता था कलम को वह थामे रहे,
उसको शायद किसी ने सुना ही नहीं।

जुल्म से कब डरा है यहाँ हौंसला,
जुल्मियों को ये शायद पता ही नहीं।
 
एक घंटा पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Ankit Kumar

10908 कविताएं

View Profile

Updesh Kumar

13122 कविताएं

View Profile

Sanjai kumar

142 कविताएं

View Profile

Arun Sharma

20 कविताएं

View Profile

Saurabh Joshi

9 कविताएं

View Profile

Jaswant Rai

3 कविताएं

View Profile

Harish Chamoli

17 कविताएं

View Profile