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आंखें खोलो

Ramakant Chaudhary

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            उठो यार, अब आँखें खोलो।
        
                                                    
                            
आज़ादी है, कुछ तो बोलो।

बीते दिन से लूट मची है।
धर्म के नाम से फूट मची है।

उल्लू चहक रहे पेड़ों पर ।
बिलख रहे सब गाँव नगर।

भारत माता है अकुलाई।
क्या चाहा था क्या छवि पाई।

बही वक्त की उल्टा धारा।
संसद ने है तुम्हें पुकारा।

उठो चलो सबकुछ न खोओ।
सुनो मित्र अब न तुम सोओ।
– रमाकान्त चौधरी
 
2 महीने पहले
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