मां शक्ति का तीसरा स्वरूप चंद्रघण्टा कहलाता है।
नवरात्रि के तीसरे दिन इनको ही पूजा जाता है।।
जब दक्षसुता हुईं सती सब देवों ने शोक मनाया था।
शिव जी हो गए वैरागी सुन तारकासुर हरषाया था।।
जब शिव-पार्वती विवाह हुआ तारकासुर घबराया।
मां पार्वती का वध करने जाटुकासुर को कैलाश पठाया।।
जाटुकासुर की चमगादड़ सेना से चारों तरफ अंधेरा छाया।
अंधेरे का उठाकर फायदा शिव-गणों का है रक्त बहाया।।
पार्वती गईंं शिव के पास तब उनने याद दिलाई है।
शैल-सुता आप हैं शक्ति पुन्ज क्यों इतनी घबराई हैं।।
मां ने लिया है अस्त्र-शस्त्र माथे पर धारण किया चंद्र।
चली गणों के साथ मर्दन करने जाटुकासुर का घमण्ड।।आते ही माता ने जाटुकासुर पर है प्रहार किया।
हाथ लिए बिना अस्त्रर-शस्त्र घंटाध्वनि से संहार किया।।
जो भी भक्त मां के इस स्वरूप को ध्याता है।
कटता है जीवन का अंधेरा उजियारे को पाता है।।