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ख़ामोश रात के साये में

RAKESH SABHAJEET MAURYA

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                            कैसा ये फेरा है मुसीबतों ने घेरा है,
        
                                                    
                            
खुशियों के आशियाने में,
गम का बसेरा है।

हर राह पर कांटे हैं,
फूलों से किनारा है,
दिल की हर तमन्ना को,
ग़म ने ऐसे घेरा है।

उम्मीद की लौ जलती,
ख़ामोश रात के साये में,
सुलगते जुगनू की महफ़िल,
फिर भी वहाँ अंधेरा है।

इस दर्द भरे सफर में,
साथ कोई न मेरा है,
दिल ने जो ख्वाब देखे,
करवटों में हर ख़्वाब तोड़ा है।

हर रोज़ की जंग में,
थक चुका ये दिल बेचारा है,
मंज़िल की चाहत है,
उलझे सब बेचारा है।

चाहें थे जो, वो सब खो चुका,
अब दिल में सिर्फ़ सन्नाटा है,
हर ख़ुशी से दूर, मैं अब यहाँ,
जहाँ गम का ही सिलसिला है।

- राकेश मौर्य
2 वर्ष पहले
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