*मैं ही रावण हूँ*...
मैं ही रावण हूँ, हर मन में बसता हूँ,
जहाँ-जहाँ घमंड है, वहीं मैं हँसता हूँ।
वेदों का ज्ञाता हूँ, शास्त्रों को पढ़ा हूँ,
मुझसे बड़ा कौन है, इसी भ्रम में पड़ा हूँ।
मेरी लंका सोने की, मैंने ही सजाया था,
सीता को छू कर मैंने, काल को बुलाया था।
राम ने तन नहीं, मेरे 'मैं' को मारा है,
एक ही बाण से, दस शीश उतारा है।
तुम पुतला जलाते हो, मैं फिर भी शर्मिंदा हूँ,
हर ईर्ष्या, हर द्वेष में, मैं ही तो जिंदा हूँ।
सच में विजय चाहिए तो, मुझको ही मिटाओ,
अपने भीतर वाले रावण को, खुद ही जलाओ....
-राकेश कुशवाहा 'ऋषि'