सुबह के उजाले मायूस न हो जाएँ, अभी रात बाक़ी है
इंसाफ़ की आवाज़ें ख़ामोश न हो जाएँ, अभी बात बाक़ी है
मक़सद नहीं, किसी को गिरा कर ख़ुद को ऊपर उठाना है
डर है इमारत कहीं ढह न जाए, अभी बरसात बाक़ी है
ये जो रोशनी उठी है, उसमें आने वाली सुबह के दीप जलते हैं
कोई उजालों की ख़ातिर ख़ुद मिट जाए, अभी ये जज़्बात बाक़ी हैं
जिस आँगन में शबनम जल जाए, वहाँ बादलों को झुकाना है
ऐसे मौसम में कोई नई फ़सलें मिटा दे, अभी ये हालात बाक़ी हैं
जिस गंगा से प्यास बुझे, ऐसी गंगा हर प्यासे को मिल जाए
धरती जलती है यहाँ, बर्फ़ीले स्तूपों से अभी मुलाक़ात बाक़ी है