सफर हो फक़त वही जो
सुहाना लगे,
ख़ूबसूरत हो इतना कि
मन को छले,
गुज़रे बादलों, झीलों, और
पहाड़ों से,
मंज़िल मेरी आ गई कब,
पता न चले.