हमारी आदतें भी किन्हीं
पेड़ों सी अजीब हैं,
आसमां छूने को चल दिए मगर
जड़ से ग़रीब हैं,
नई पौध तरसती है सूरज की
रोशनी को,
फैला रखी हैं शाख़ें उनके सरों पर,
हम इतने शरीफ हैं.