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हक़ की आवाज़

Rajiv Tyagi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ज़िंदगी चलाने की सहूलियत भी अब तो
        
                                                    
                            
क़िस्मत की तरह आती है,
कभी रुकी सी लगे है तो कभी सड़ांध और
दुश्वारियां साथ लाती है,
क़िस्मत क्यूँ मान बैठते हैं हम चुने हुए
नुमाइंदों की बदअख़लाक़ी को,
उठती है जब अपने हक़ की आवाज़ ऊंची,
बहरों तक भी आवाज़ जाती है.

 
एक महीने पहले
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