ज़िंदगी चलाने की सहूलियत भी अब तो
क़िस्मत की तरह आती है,
कभी रुकी सी लगे है तो कभी सड़ांध और
दुश्वारियां साथ लाती है,
क़िस्मत क्यूँ मान बैठते हैं हम चुने हुए
नुमाइंदों की बदअख़लाक़ी को,
उठती है जब अपने हक़ की आवाज़ ऊंची,
बहरों तक भी आवाज़ जाती है.
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X