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किसी और की धड़कन को अपने भीतर सुना

Rajeshwari Joshi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जब पहली बार धड़कनों ने
        
                                                    
                            
किसी और की धड़कन को अपने भीतर सुना,
तभी से एक स्त्री
सिर्फ़ स्त्री नहीं रही—
वह ममता का अथाह सागर बन गई।

उसकी हर साँस में
एक नई प्रार्थना जन्म लेने लगी,
हर पीड़ा मुस्कान में बदल गई,
हर रात जागकर भी
वह सुबह से अधिक उजली दिखी।

नन्हीं उँगली का स्पर्श
उसके जीवन का सबसे बड़ा
सम्मान बन गया,
पहली मुस्कान, पहला शब्द, पहला कदम—
ये छोटे-छोटे क्षण ही
उसके समूचे संसार का
उत्सव बन गए।

वह स्वयं धूप में जलती रही,
पर बच्चे के हिस्से
सिर्फ़ छाँव लिखती रही।
अपने अधूरे सपनों को
उसकी आँखों में पूरा होते देख
वह हर बार फिर से जी उठी।

मातृत्व केवल जन्म देना नहीं,
अपने अस्तित्व को
प्रेम की लौ में गलाकर
एक नए जीवन को आकार देना है।
यह त्याग भी है, तप भी है,
करुणा भी है, शक्ति भी है।

सच तो यह है—
ईश्वर ने यदि प्रेम को
कोई रूप दिया होगा,
तो वह निस्संदेह
एक माँ की गोद ही होगी,

जहाँ हर भय सो जाता है
और हर सपना
मुस्कुराना सीख जाता है।
-राजेश्वरी पंत जोशी
 
2 महीने पहले
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