ज़िंदगी शायद किसी दर्ज़ी को उलझी मिली है,
रोज़ थोड़ा-सा उधड़ती, रोज़ थोड़ा-सा सिली है।
धूप की इक तह किसी ने रख दी थी अलमारी में,
आज तक उस तह से आती धूप भी कुछ गुनगुनी है।
घर की दीवारों पे अब ख़ामोशियाँ टँगी हैं,
एक हँसी की कील जाने कब से उनमें ही गड़ी है।
चाय की प्याली में अक्सर शाम घुल जाती है चुपचाप,
भाप की उँगली ने जैसे याद की खिड़की छुई है।
एक काग़ज़ की नाव अब भी बारिशों से दोस्ती में,
बचपनों की भीगती-सी ज़िद कहीं अब भी पड़ी है।
वक़्त ने सब नाम चेहरों से बहुत धीरज से धोए,
दिल की मिट्टी पर मगर इक लिखावट अनसुनी है।
आईनों से रोज़ मिलकर लौट आता हूँ मुसाफ़िर,
चेहरे के पीछे कोई आवाज़ अब भी अनछुई है।
नींद के तकिए तले रख दी थीं कुछ अधखुली बातें,
सुबह देखा, उन पे ख़्वाबों की महीन-सी लड़ी है।
ज़िंदगी शायद किसी दर्ज़ी से उलझी सिली है,
रोज़ थोड़ा-सा उधड़ती, रोज़ थोड़ा-सा सिली है।