कहां कहां समेटूं ऐ जिंदगी तुझे
जिधर भी देखूं बिखरी पड़ी है
कभी कभी लगता है
अब न कोई सपने
अब न कोई हसरतें
फिर भी चलते जा रहा हूं
बे-डगर
बे-ख़बर
दिशाहीन
जैसे मति क्षीण
अक्सर थककर
जब भी बैठता हूं सुस्ताने
परेशान करने लगते है
फिर वही खयालात
फिर वही सवालात
कि कहां जाना था,
और कहां खो गया
क्या क्या छूटा हाथ से
सोच सोच कर रो दिया
किसके लिए भागा मैं दिन भर,
किसके लिए हुआ उदास
छोड़ गये वो भी तनहा
आशा लेकर चले थे जिसके साथ
फिर भी देता हूं एक ढ़ाढ़स
खुद से खुद को
यह सोच कर कि
उठूंगा फिर कल,
इसी थकान को लेकर,
कोई मिले या न मिले
क्या फर्क पड़ता है
जब चलना है अकेले तो
चलते चलो उस अनंत पथ पर
खुद से खुद के मिलने तक।