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मेहनतकश इंसान

Rajesh Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हथेलियों पर जमी वक़्त की झाइयाँ भारी हैं,
        
                                                    
                            
मगर ये छेनियाँ पत्थर पर अब भी भारी हैं।

बनाकर ख़ाक जो आबाद कर रहा है दुनिया,
उसी की ज़ात पर सदियों से ये उधारी है।

उधर गिने जा रहे हैं मुनाफ़े के सुनहरे सिक्के,
इधर मज़दूर के घर में फ़क़त बेवसी-लाचारी है।

बिवाई फट गई पैरों में चलकर तीखे काँटों पर,
मगर पहाड़ को ढहाने की ज़िद अभी भी जारी है।

किया राष्ट्र को रोशन, लहू जलाकर ख़ुद को जिसने,
उसी के झोंपड़े में स्याह अँधेरे की बीमारी है।

जिसे बनाना था राष्ट्र का सबसे बड़ा हिस्सेदार,
उसी की क़िस्मत में ज़िल्लत की ये चौकीदारी है।

कुछ पूँजीपतियों के मुलायम हाथ ये क्या समझें,
कि बहते आँसुओं से कैसे गूँध रही रोटी हमारी है।

सियासतों को बस चुनावी भीड़ दिखाई दी है यहाँ,
मज़दूर की तो पत्तल हमेशा से रही अधूरी है।

तमाम बाधाओं से टकराकर हौसला न गिरा कभी,
श्रम की प्रार्थना के आगे झुकी दुनिया सारी है।

तख़्त, ताज और राजमहल एक दिन झुकेंगे ज़रूर,
अब इस नए दौर में हम सब मेहनतकशों की बारी है।

बना है राष्ट्र जो बुलंद इतना, तो याद रखे हर कोई,
कि हर एक ईंट में मज़दूर के पसीने की हिस्सेदारी है।

कलम के ज़रिये 'अगस्त्य' विनम्रता से सच लिखता है,
हर मेहनतकश इंसान की मेहनत सबसे भारी है।
-राजेश शर्मा 'अगस्त्य'
 
एक दिन पहले
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