खुद से टूटा, खुद से रूठा, किसे भला मनाएगा?
चाँदनी रात का जलता जुगनू, किसका तम भगाएगा?
दिल में उसकी चाह बसी है, नयनों ने जिसे देखा न,
दो नयनों में बसने वाला, क्या दिल में भी आ जाएगा?
चारदीवारी के इस कमरे में, एक मासूम परिंदा रहता है,
खुली हवा में उड़ने वाला, कब इस पिंजरे में आएगा?
यह खुली आँखों का सपना है—जिसे चाहना, उसे पाना,
रातों के सपने देखने वाला, क्या हक़ीक़त बन जाएगा?
जिसको हमने अपना समझा, वो अपना कब हो पाएगा?
तूफ़ानों के बीच जलता दीया, कब तक जल पाएगा?
दुख का मलाल किससे करें, जब सुख भी अपना न हो पाया, 'अगस्त्य', ये ऋतुओं का मंजर है, कभी आएगा, कभी जाएगा।
-राजेश शर्मा 'अगस्त्य'