परम तत्व से छूटकर, आई धरा पर जान,
कर्म-भोग को भोगने, मिली मनुज-पहचान॥
पूर्व जन्म के कर्म का, करना था विधान,
ईश्वर-लीला रच गई, खुला सत्य का ज्ञान॥
बाल्यकाल निश्छल रहा, यौवन में अभ्यास,
कर्म और अध्यात्म से, जीवन का विकास॥
कर्तव्य निभते ही रहे, रिश्ते रहे सँभाल,
कर्म-योग के साथ ही, चलता रहा संसार॥
चालीस के बाद मन में, जागा गहरा ज्ञान,
जीत-हार दोनों लगे, एक-सरीखे समान॥
पचास में मन थम गया, घटा मोह का वेग,
संसार के बीच रहकर, जागा भीतर विवेक॥
साठ में सुमिरन जगा, मिटी संग्रह की चाह,
परमार्थ और प्रेम से, खुलती गई नई राह॥
सत्तर में हठ छूटा, मन ने साधा मौन,
“सही होने से शांत भला”, प्रेम बचा फिर कौन॥
अस्सी में अनुभव बना, जीवन का उजियार,
उपस्थिति से बाँटता, स्नेह और उपकार॥
नब्बे में अभिमान मिटा, समता बनी पहचान,
दोष न देखा और का, निर्मल हुआ मन-प्राण॥
सौ बरस की यात्रा में, प्रेम रहा आधार,
काया छूटी, आत्मा चली, परम-प्रकाश के द्वार॥
चिंताएँ सब व्यर्थ थीं, दिखा परम का हाथ,
मानव से माधव मिला, पूर्ण हुई जीवन की बात॥
-राजेश शर्मा 'अगस्त्य'