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बिछड़े नीर

Rajesh Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            चलो अब ख़ुद को ख़ुद से जुदा करते हैं,
        
                                                    
                            
बिछड़े नीर फिर कहाँ दरिया से मिला करते हैं।

जो माँगे वो कोई ज़रूरतमंद ही होता है,
भरे पेट लोग कहाँ बात किया करते हैं।

वो ज़रा सा क्या ठहरा हमने घर ही बसा लिया,
उजड़ने में कब सदियां बरस लगा करते हैं।

हवस ने ही पाक मुहब्बत को बरवाद किया है,
यूं भी आशिक कहाँ ख़याल किया करते हैं।

सब रिश्ते यहाँ धीरे धीरे छूटते जाते हैं,
मचा कर शोर, कब लोग ख़फ़ा करते हैं।

जो वादे करते हैं, वो ही वादे तोड़ते हैं,
जो सच्चे हैं वो तन्हा भी जी लिया करते हैं।

जो गिरते हैं, वो ही सम्भल कर चलते हैं,
सहारे पर कहाँ आसमान टिका करते हैं।

ये मतलब की दुनिया है बदलती रहती है,
हैं अपने जो, वो ही राह मुड़ा करते हैं।

'अगस्त्य' इस टूटे दिल को टूटा ही रहने दो,
जुड़े हुए दिल तो फिर से गिला करते हैं।
-राजेश शर्मा 'अगस्त्य'
 
2 महीने पहले
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